Parents' Worship Day
(14th Feb)
किसी के बारे में यदि जानना है तो सबसे पहले उसका इतिहास जानना आवश्यक होता है तभी उसकी महत्वपूर्णता को समझा जा सकता है। अतः माता - पिता पूजन दिवस का इतिहास मैं यहाँ बताना आवश्यक समझती हूँ :-
एक बार भगवान शंकर एवं माता पार्वती के दोनों पुत्रो में होड़ लग गई कि "कौन बड़ा ?"
कार्तिकेय ने कहा:"गणपति ,मैं तुमसे बड़ा हूँ "।
गणपति :"आप भले ही उम्र में मुझसे बड़े है लेकिन गुणों में भी बड़प्पन होता है। "
निर्णय लेने के लिए दोनों अपने माता पिता के पास गए ।
शिव-पार्वती ने कहा :" जो संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करके पहले पहुंचेगा ,उसे ही बड़ा माना जाएगा ।"
कार्तिकेय अपना वाहन 'मयूर ' ले के निकल गए । गणेश जी का वाहन मूषक था,जिसपे परिक्रमा करने में काफी समय लग जाता और गणेश जी कार्तिकेय से जीत नहीं पाते ।अतः वो एकांत में गए और थोड़ी देर शांत होकर उपाय सोचा ।
गणेशजी अपने माता-पिता के पास आए और उन्हें ऊँचे आसन पर बैठा के पुष्पों से उनके श्री-चरणों की पूजा करने के पश्चात परिक्रमा की । इस प्रकार सात परिक्रमा पूरी करने के पश्चात माता-पिता को प्रणाम किया।
शिव-पार्वती ने पूछा :"वत्स ,ये परिक्रमा क्यूँ की?"
गणपति :"सर्वतीर्थमयी माता ... सर्वदेवमयो पिता ... संपूर्ण पृथ्वी की परिक्रमा करने से जो पुण्य होता है वाही पुण्य माता की परिक्रमा करने से होता है, यह शास्त्र वचन है । पिता का पूजन करने से सब देवताओं का पूजन हो जाता है क्योंकि पिता देव सामान है । अतः आप दोनों की परिक्रमा करके पृथ्वी की भी सात बार परिक्रमा कर ली है ।"
इस प्रकार गणेशजी ने अपनी चतुराई से कार्तिकेय जी से पहले परिक्रमा पूरी करली और सभी देवो में "प्रथम पूजनीय " हो गए ।
इस कथा में जिस प्रकार कार्तिकेय जी परिक्रमा करने के लिए तुरंत निकल पड़े और काफी समय बाद परिक्रमा पूरी करने के बाद जब वापस लौटे तब भी उन्हें वो प्राप्त नहीं हुआ जो उन्हें चाहिए था ,वो थी "सफलता "। इसी प्रकार हमसब भी पूरे संसार में सच्चा प्रेम ढूंढते रहते है ,न जाने कितना समय व्यर्थ करते हैं,और अंत में हाथ क्या आता है? "कुछ नहीं" या बस उदासी या हार।
यदि हम भी गणेशजी की ही तरह इधर-उधर भटके बिना अपने माता पिता के चरणों में और उन्ही के आस पास उस प्रेम को ढूंढें तो वो हमे अवश्य मिल जाएगा। इसीलिए "परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू" ने कहा है की "प्रेम दिवस या 14th Feb" ज़रूर मनाए लेकिन प्रेम-दिवस में संयम और सच्चा विकास होना चाहिए। हिन्दू,इसाई,यहूदी या मुसलमान या और किसी भी धर्म के मानने वाले माता-पिता कभी नहीं चाहते की उनके बच्चे गलत राह पर चले ,कुसंस्कारी हो। माता-पिता की अवज्ञा करके विकारी और स्वार्थी जीवन जी कर तुच्छ हो जाए और बुढापे में कराहते रहे। आंकड़े बताते हैं की 14 फरवरी को न जाने कितने करोड़ो,अरबों रुपयों की शराब बिक जाती है और किशोर-किशोरियां कुसंस्कारी हो अपनी संस्कृति की शोभा को भूल जाते है। अतः बच्चे माता-पिता व गुरुजनों का सम्मान करे तो उनके ह्रदय से विशेष मंगलकारी आशीर्वाद उभरेगा , जो देश के इन भावी कर्णधारो को "Valentines Day" जैसे विकारों से बचाकर गणेशजी की तरह इन्द्रिय संयम व आत्मसामार्थ्य विकसित करने में मददरूप होगा ।
अतः हम विरोध करने के बजाय इस आंधी को जो 14th February की आंधी है ,एक नई दिशा दे देते हैं "माता-पिता पूजन दिवस " के रूप मे। अगर हमे किसी लकीर को छोटा करना है तो ज़रूरी नहीं है की उसे मिट़ाया ही जाए ,बस उसके सामने एक बड़ी लकीर खीच देने से वो खुद ब खुद छोटी हो जाएगी । यही उद्देश्य है "माता-पिता पूजन दिवस " मनाने का।जिस प्रकार "परम पूज्य संत श्री आसारामजी बापू" की प्रेरणा से ये दिवस पूरे भारत में ही नहीं अपितु विश्व भर में मनाया जाता है और साईं चांडूरामजी की आज्ञा से इस बार वर्ष 2013 में ये दिवस इलाहबाद के "साईं आसूदाराम धाम " में भी मनाया गया उसी प्रकार मैं आशा करती हूँ की ये समस्त भारत में क्या विश्व में सभी के द्वारा मनाया जाए ।
हरी ॐ !!
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